<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" ?><!-- generator=Zoho Sites --><rss version="2.0" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"><channel><atom:link href="https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/festivals-and-occasions/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><title>Test store 1 - &lt;script&gt;alert('XSS');&lt;/script&gt; , festivals-and-occasions</title><description>Test store 1 - &lt;script&gt;alert('XSS');&lt;/script&gt; , festivals-and-occasions</description><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/festivals-and-occasions</link><lastBuildDate>Sat, 23 May 2026 01:02:48 +0530</lastBuildDate><generator>http://zoho.com/sites/</generator><item><title><![CDATA[चैत्र नवरात्रि घटस्थापना महुरत 2021]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/chaitranavratri-ghatsthapna-mahurat-2021</link><description><![CDATA[भारत में नवरात्रि मुख्य रूप से दो बार मनाई जाती है। एक शारदीय नवरात्रि जो नवंबर के महीने में आती है। इस नवरात्रि में महाअष्टमी और महानवमी का त्यौहार आ ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_hYpDnZiGQp259mF2O72BQg" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_HrZC1UjbS0WUC055OuWF6Q" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_j8Cvq5m8RlenuBStXDT0zQ" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_T0V-shY0QS2_grdP6IDFAw" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div><strong>भारत</strong> में नवरात्रि मुख्य रूप से दो बार मनाई जाती है। एक <strong>शारदीय नवरात्रि</strong> जो नवंबर के महीने में आती है। इस नवरात्रि में <strong>महाअष्टमी</strong> और <strong>महानवमी</strong> का त्यौहार आता है। वहीं, एक <strong>चैत्र नवरात्रि</strong> जो मार्च या अप्रैल के महीने में मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि में राम नवमी का पर्व आता है। दोनों ही नवरात्रि में <strong>मां दुर्गा</strong> के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्रि में हम मां दुर्गा की मूर्तियां भले ही न बैठाते हों लेकिन विधान के अनुसार, हम उनकी पूरे श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं। इस बार चैत्र नवरात्रि 13 अप्रैल, 2021 को शुरू हो रही है। इस बार दुर्गा अष्टमी 20 अप्रैल, 2021 को होगी और <strong>श्रीराम नवमी</strong> 21 अप्रैल, 2021 को होगी. हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार हर साल चैत्र महीने के पहले दिन से ही <strong>नव वर्ष</strong> की शुरुआत हो जाती है। साथ ही इसी दिन से चैत्र नवरात्रि भी शुरू हो जाती हैं। इसे महाराष्ट्र में <strong>गुड़ी पड़वा</strong> के तौर पर भी जाना जाता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इस पर्व को <strong>उगादि</strong> के रूप में मनाया जाता है। इस साल नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त, अभिजीत मुहूर्त, सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग आदि शुभ मुहूर्त बन रहे हैं। &nbsp; <strong>घटस्थापना के दिन शुभ मुहूर्त-</strong> अमृतसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से दोपहर 02 बजकर 19 मिनट तक। सर्वार्थसिद्धि योग - 13 अप्रैल की सुबह 06 बजकर 11 मिनट से 13 अप्रैल की दोपहर 02 बजकर 19 मिनट तक। अभिजीत मुहूर्त - दोपहर 12 बजकर 02 मिनट से&nbsp; दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक। अमृत काल - सुबह 06 बजकर 15 मिनट से 08 बजकर 03 मिनट तक। ब्रह्म मुहूर्त- सुबह 04 बजकर 35 मिनट से सुबह 05 बजकर 23 मिनट तक। &nbsp; <strong>नवरात्रि </strong><strong>की</strong><strong>अंखड</strong><strong>ज्योति</strong><strong>: </strong>नवरात्रि की अखंड ज्योति का बहुत महत्व होता है। आपने देखा होगा मंदिरों और घरों में नवरात्रि के दौरान दिन रात जलने वाली ज्योति जलाई जाती है। माना जाता है हर पूजा दीपक के बिना अधूरी है और ये ज्योति ज्ञान, प्रकाश, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक होती है। <strong>नौ </strong><strong>दिन</strong><strong>या</strong><strong>रात</strong><strong>: </strong>अमावस्या की रात से अष्टमी तक या प्रतिपदा से नवमी की दोपहर तक व्रत-नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहां रात गिनते हैं इसलिए नवरात्र यानी नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक द्वारा हमारे शरीर को 9 मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारु रूप से क्रियाशील रखने के लिए 9 द्वारों की शुद्धि का पर्व 9 दिन मनाया जाता है। शरीर को सुचारु रखने के लिए विरेचन, <strong>सफाई या शुद्धि प्रतिदिन</strong> तो हम करते ही हैं किंतु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है। <strong>सात्विक आहार</strong> के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है। स्वच्छ मन-मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है। नवरात्र पर्व से जुड़े यदि समस्या, सवाल हो तो आप हमें <a href="mailto:askus@jaymahakaal.com">askus@jaymahakaal.com</a> पर या नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। ओरिजिनल रत्न, रुद्राक्ष, क्रिस्टल, कुंडली खरीदने हेतु या रेकी और कुंडली से जुड़ी समस्या के लिए आप हमसे <a href="tel:9152203064">9152203064</a> पर संपर्क कर सकते हैं। साथ ही जुड़े रहे हमसे @jaymahakaal01 पर और विजिट करते रहें&nbsp; <a href="http://localhost:10004/">www.jaymahakaal.com</a> &nbsp; &nbsp;</div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Sun, 11 Apr 2021 12:16:32 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[गुप्त नवरात्रि कब से है? आईये जानते हैं इसकी विशेषता एवं पूजन]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/when-is-gupta-navaratri-and-from-when-it-starts</link><description><![CDATA[गुप्त नवरात्रि के दौरान गुप्त रूप से देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों को ‘शक्ति’ के रूप में जाना जाता है। गुप्त नवरात्रि के पीछे मुख्य कारण क्या है जानते ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_tn0VQFjpSQ68Cl1yywUKlw" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_6Z3avaICT0WWnEtcfTQ4CQ" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_4q50KE-pTt-ei2aC9azcnA" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_5QD1UD0cTbSHQQ8XpTEk6A" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div>गुप्त नवरात्रि के दौरान गुप्त रूप से देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों को ‘शक्ति’ के रूप में जाना जाता है। गुप्त नवरात्रि के पीछे मुख्य कारण क्या है जानते है आईये, कि देवी की पूजा गुप्त रूप से की जाती है, जो बाकी दुनिया से छिपी होती है। यह मुख्य रूप से साधुओं और तांत्रिकों द्वारा शक्ति की देवी को प्रसन्न करने के लिए व तंत्र साधना के लिए मनाया जाता है जो हमेशा से गलत सोच है ओर कारण भी गुप्त नवरात्रि हो या नवरात्रि हमेशा साधक या सिद्ध संत ,तांत्रिक हमेशा जो साधनाये करते है उनको गुप्त रखा जाता है यही सत्य है उनको उजागर ना करके गोपनियता बनाये रखता है । जिनकी चर्चा केवल गुरू शिष्य मे हो सकती है यह आम आदमी भी कर सकते है । जिनमे सेवा ओर परोपकार की दृष्टिकोण हो पर हमेशा ध्यान रहे सिद्धियो के पीछे भागने से सिद्धियाँ नही मिलती बस आप कर्म करते रहे उनकी कृपा मिल ही जाती है, । मित्रो गुप्त नवरात्रि के दौरान गुप्त अनुष्ठान किए जाते हैं जहां देवी दुर्गा की पूजा इस समय के दौरान देवी दुर्गा के नव रूपो या सिद्ध दसमहाविधा के रूपों को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। इनके अलावा ग्रहण, तीज त्योहार, पर्व मे भी साधनाये होती है जो अति गुप्त रहती है जिनको उजागर नही किया जाता यही सत्य है नादान बालक की कलम से आज बस इतना ही बाकी फिर। और मित्रो ऐसा माना जाता है कि इस त्यौहार के दौरान भक्त देवी की पूजा करके अपनी सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं लेकिन अनुष्ठानों को गुप्त रखने की आवश्यकता होती है क्योंकि पूजा की सफलता इसके पीछे गोपनीयता की मात्रा पर निर्भर करती है। <strong>गुप्त नवरात्रि के दौरान पूजी जाने वाली देवी दुर्गा के विभिन्न रूप हैं-</strong><ol><li>माँ कालिके</li><li>तारा देवी</li><li>त्रिपुर सुंदरी</li><li>भुवनेश्वरी</li><li>माता चित्रमस्ता</li><li>त्रिपुर भैरवी</li><li>माँ धूम्रवती</li><li>माता बगलामुखी</li><li>मातंगी</li><li>कमला देवी</li></ol> इस शुभ अवसर के दौरान मंत्रों का जाप, देवी दुर्गा की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं और राक्षस महिषासुर का मुकाबला करने के लिए कैसे सभी देवताओं की शक्तियां देवी में समाहित हुईं ताकि वह उसका वध कर सकें, और दुनिया की बुरी शक्तियों पर उनकी जीत हो। पूजा के दौरान प्रथाऐं - गुप्त नवरात्रि गुप्त नवरात्रि के दौरान, तंत्र मंत्र साधना में विश्वास करने वाले, अपने गुप्त तांत्रिक क्रियाकलापों के साथ-साथ सामान्य नवरात्रि की तरह ही उपवास करते हैं और अन्य अनुष्ठान करते हैं। 9 दिनों तक अखंड ज्योति जलाई जाती है। <strong>कलश स्थापन 2021:</strong> देवी दुर्गा के सामने दुर्गा सप्तशती मार्ग और मार्खदेव पुराण का पाठ किया जाता है। नवरात्रि के सभी दिनों में उपवास या सात्विक आहार का सेवन किया जाता है। <strong>गुप्त नवरात्रि व्रत का पालन करने के लाभ:</strong> गुप्त नवरात्रि, जिसे गायत्री नवरात्रि के रूप में भी जाना जाता है, हिंदू कैलेंडर के आषाढ़ महीने के दौरान मनाया जाता है जो आमतौर पर जून-जुलाई के बीच आता है। इस 9-दिवसीय धार्मिक क्रिया के दौरान देवी दुर्गा को प्रसन्न करने का मुख्य तरीका तंत्र विद्या के मंत्रों के साथ देवी के शक्तिशाली आह्वान को मंत्रमुग्ध करना है। गुप्त नवरात्रि के दौरान पूजा की सबसे प्रसिद्ध विधि तांत्रिक विद्या है जिसमें धन, बुद्धि और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी दुर्गा की आराधना शामिल है। गुप्त नवरात्रि की पूजा शैतानी ताकतों के प्रभाव को खत्म करने के लिए की जाती है? जिसे भक्तों के दिलों से बुराई के डर को दूर करने के लिए शक्तिशाली माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुप्त नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा को शक्तिशाली मंत्र और गुप्त तंत्र विद्या व तांत्रिक साधनाओं के रूप में गुप्त पूजा की पेशकश की जाती है, जो भक्तों को सभी इच्छाओं और आशाओं को पूरा करने के लिए विशेष शक्तियां प्राप्त करने में मदद करती हैं। ओर दसवे दिन भैरव बाबा की पुजा होती है यह केवल जानकार या गुरू गाम्य शिष्य करते है,। कुछ पुजा अर्चना के संबंध मे जानकारी, और मुर्हत,। नवरात्रि के लिए पूजा सामग्री ● माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र ● लाल चुनरी ● आम की पत्तियाँ ● चावल ● दुर्गा सप्तशती की किताब ● लाल कलावा ● गंगा जल ● चंदन ● नारियल ● कपूर ● जौ के बीच ● मिट्टी का बर्तन ● गुलाल ● सुपारी ● पान के पत्ते ● लौंग ● इलायची <strong>नवरात्रि पूजा विधि </strong> ● सुबह जल्दी उठें और स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें ● ऊपर दी गई पूजा सामग्री को एकत्रित करें ● पूजा की थाल सजाएँ ● माँ दर्गा की प्रतिमा को लाल रंग के वस्त्र में रखें ● मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोयें और नवमी तक प्रति दिन पानी का छिड़काव करें ● पूर्ण विधि के अनुसार शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित करें। इसमें पहले कलश को गंगा जल से भरें, उसके मुख पर आम की पत्तियाँ लगाएं और उपर नारियल रखें। कलश को लाल कपड़े से लपेंटे और कलावा के माध्यम से उसे बाँधें। अब इसे मिट्टी के बर्तन के पास रख दें ● फूल, कपूर, अगरबत्ती, ज्योत के साथ पंचोपचार पूजा करें ● नौ दिनों तक माँ दुर्गा से संबंधित मंत्र का जाप करें और माता का स्वागत कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें ● अष्टमी या नवमी को दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन करें और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों (पूड़ी, चना, हलवा) का भोग लगाएं ● आखिरी दिन दुर्गा के पूजा के बाद घट विसर्जन करें इसमें माँ की आरती गाएं, उन्हें फूल, चावल चढ़ाएं और बेदी से कलश को उठाएं,। नादान बालक की कलम से आज बस इतना ही बाकी फिर कभी अब मुहूर्त के बारे मे जानते है। नवरात्रि शुरू : 12 फरवरी 2021, दिन शुक्रवार नवरात्रि समाप्त : 21 फरवरी 2021, दिन रविवार कलश स्थापना मुहूर्त सुबह : 08:34 AM से 09:59 AM अभिजीत मुहूर्त दिन में : 12:13 PM से 12:58 PM <p lang="en-IN">हमारे facebook लिंक <a href="https://www.facebook.com/JayMahakal01/">https://www.facebook.com/JayMahakal01/</a> को लाइक और शेयर&nbsp;करें ट्विटर&nbsp;और इंस्टाग्राम पर फॉलो करे हमारा handle है @jaymahakaal01 और नित नई जानकारियो के लिए हमसे जुड़े रहिये और विजिट करते रहिए <a href="http://localhost:10004">www.jaymahakaal.com</a></p> हिन्दू संस्कृति या सनातन धर्म के बारे में, व्रत, त्योहार की तिथि नियम जैसे किसी भी प्रकार की जानकारी साझा करने हेतु अथवा रेकी, नुमेरोलॉजी, हीलिंग, रुद्राक्ष, क्रिस्टल, कुंडली, वास्तु, हस्त रेखा, विवाह, घर, धन में कमी, प्रमोशन, नौकरी इत्यादि से सम्बंधित कोई समस्या हो तो आप हमें इस नंबर पर व्हाट्सप्प कर सकते हैं 9152203064 <span lang="en-IN">हमारी </span><span lang="hi">ईमेल</span><span lang="hi">आईडी</span><span lang="en-IN">askus@jaymahakaal.com </span><span lang="en-IN">पर </span><span lang="hi">संपर्क</span><span lang="hi">कर</span><span lang="hi">सकते</span><span lang="hi">है।</span></div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Thu, 28 Jan 2021 08:30:50 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[जानिए नवरात्रि में माँ के किस रूप को कौन सा भोग पसंद है?]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/which-are-the-offerings-does-one-needs-to-offer-to-9-forms-goddess-during-navratri-2020</link><description><![CDATA[17 अक्टोबर यानी शनिवार से शारदीय नवरात्रि (नवरात्रि 2020) शुरू हो रहे हैं. स्‍वर्ग से धरती पर उतर रहीं देवी के लिए यह धरती उनका मायका है. अतः घर आई बे ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_0w4Abk-tTM2rH9td4JaX0w" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_CqlW-2GCRSyhEO4JfihjlQ" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_1PiNSG-zRHCjkQbGXQaTeA" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_Isuu-8N8Td-C0r0mplvC5A" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div>17 अक्टोबर यानी शनिवार से शारदीय नवरात्रि (नवरात्रि 2020) शुरू हो रहे हैं. स्‍वर्ग से धरती पर उतर रहीं देवी के लिए यह धरती उनका मायका है. अतः घर आई बेटी को अच्छा भोजन और श्रृंगार अर्प‍ित किया जाता है. आइए जानते हैं कि इन नौ दिनों में मां दुर्गा को क्या-क्या भोग लगाना चाहिए. शंकरजी की पत्नी एवं नव दुर्गाओं में प्रथम <strong>शैलपुत्री</strong> दुर्गा का महत्व और शक्तियां अनंत है. अगर आप बीमारी से परेशान हैं तो इस दिन मां को घी का भोग लगाएं. आपके सारे दुःख ख़त्म होते हैं. द्वितीया तिथि पर <strong>मां ब्रह्मचारिणी</strong>&nbsp; की पूजा होगी. नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को शक़्कर, सफेद मिठाई एवं मिश्री का भी भोग लगाया जा सकता है. नवरात्रि के तीसरे दिन तृतीया तिथि है और इस दिन <strong>मां चंद्रघंटा</strong> (चंद्रघनटा) की पूजा होगी. मां के इस रूप को दूध, मेवायुक्त खीर या फिर दूध से बनी मिठाईयों का भी भोग लगाकर मां की कृपा पा सकते हैं. इससे भक्तों को समस्त दुखों से मुक्ति मिलती हैं. नवरात्रि के चौथे दिन चतुर्थी तिथि पर <strong>मां कूष्मांडा</strong> (कूशमंदा) की पूजा करें. मालपुआ से मां कुष्मांडा बेहद प्रसन्‍न होती हैं. मां के कुष्मांडा के इस रूप की कृपा से निर्णंय लेने की क्षमता में वृद्धि एवं मानसिक शक्ति अच्छी रहती है. नवरात्रि के पांचवें दिन पंचमी तिथि है और इस दिन <strong>मां स्कंदमाता</strong> (स्कंडमाता) की पूजा होगी. शारीरिक कष्टों के निवारण के लिए माता का भोग केले का लगाएं. नवरात्रि के छठे दिन षष्ठी तिथि है और इस दिन <strong>मां कात्यायनी</strong> की पूजा होगी. देवी को प्रसन्न करने के लिए शहद और मीठे पान का भी भोग लगाया जाता है. नवरात्रि के सातवें दिन सप्तमी तिथि है और इस दिन <strong>मां कालरात्रि</strong> की पूजा होगी. मां कालरात्रि को काली मिर्च, श्‍यामा तुलसी या काले चने का भोग लगाया जाता है. वैसे नकारात्मक शक्तियों से बचने के लिए आप गुड़ का भोग लगा सकते हैं. नवरात्रि के आठवें दिन अष्टमी तिथि है और इस दिन महागौरी की पूजा होगी. इस दिन <strong>मां महागौरी</strong> को साबूदाना अर्पित किया जाता है. ये अन्न-धन को देने वाली हैं. वैसे इन्‍हें नारियल भी पसंद है. संतान सुख की प्राप्ति के लिए आप इन्‍हें नारियल का भोग लगाएं. नवमी के दिन <strong>सिद्धिदात्री</strong> की पूजा की जाती है. कोई भी अनहोनी से बचने के लिए इस दिन मां के भोग में अनार को शामिल किया जाता हैं. &nbsp; हमारे facebook लिंक <a href="https://www.facebook.com/JayMahakaal01/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">https://www.facebook.com/JayMahakal01/</a> को like और share करें twitter और instagram पर फॉलो करे हमारा handle है @jaymahakaal01 और नित नई जानकारियो के लिए हमसे जुड़े रहिये और विजिट करते रहिए <a href="http://localhost:10004" target="_blank" rel="noreferrer noopener">www.jaymahakaal.com</a> आप हमसे मेल के माध्यम से संपर्क कर सकते है हमारी EMail id है askus@jaymahakaal.com</div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Thu, 15 Oct 2020 12:37:26 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[नवरात्र में माँ के स्वरूप के कुछ पूजा एवं नियम]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/some-rules-and-regulations-of-worshipping-various-incarnations-of-goddess-during-navratri-2020</link><description><![CDATA[मां दुर्गा की आराधना को समर्पित नवरात्रि के पहले दिन कलश या घट स्थापना से व्रत का प्रारंभ होता है। नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापना कर व्रत का संकल्प ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_rGPTdE7rSk2Z5aw3b--Kdw" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_fe6xYMg3QhuogNAMcUyHwA" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_9knBkjGzTBeN70fTayttqw" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_oXpXoZfXQvSO9D0svHFxKA" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div>मां दुर्गा की आराधना को समर्पित नवरात्रि के पहले दिन कलश या घट स्थापना से व्रत का प्रारंभ होता है। नवरात्र के प्रथम दिन कलश स्थापना कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। नवरात्र व्रत की शुरुआत प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना से की जाती है। नवरात्र के 10 दिन प्रात: और संध्या के समय भगवती दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। श्रद्धानुसार अष्टमी या नवमी के दिन हवन और कुमारी पूजा कर भगवती को प्रसन्न करना चाहिए। नवरात्र में हवन और कन्या पूजन अवश्य करना चाहिए। नारदपुराण के अनुसार हवन और कन्या पूजन के बिना नवरात्र की पूजा अधूरी मानी जाती है। साथ ही नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा के लिए लाल रंग के फूलों व रंग का अत्यधिक प्रयोग करना चाहिए। नवरात्र में <strong>&quot;श्री दुर्गा सप्तशती&quot;</strong> का पाठ करने का प्रयास करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माता दुर्गा नौ दिनों के लिए पृथ्वी लोक में वास करती हैं, इसलिए शारदीय नवरात्रि का महत्व बढ़ जाता है। इन दिनों में यदि विधि विधान से माता की आराधना की जाए, तो वह प्रसन्न होंगी और सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगी। नवरात्रि में माता शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा देवी, कुष्मांडा देवी, स्कंदमाता, माता कात्यायनी, मां कालरात्रि , महागौरी और माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यदि आपने नवरात्रि का व्रत रखने का निर्णय लिया है तो आपके लिए यह जानना जरूरी है कि आपको नवरात्रि की पूजा में किन-किन वस्तुओं का इस्तेमाल करना है। 1. माता दुर्गा की नई मूर्ति या तस्वीर - यदि पूजा घर में दुर्गा माता की पुरानी तस्वीर या मूर्ति है, तो उसे हटाकर नई तस्वीर स्थापित करनी होगी। यदि माता की मूर्ति मिट्टी की है, तो बहुत अच्छा रहेगा। 2. माता के लिए नई लाल चुनरी - माता की तस्वीर पर चढ़ाने के लिए नई लाल चुनरी लें। मूर्ति रखी है तो उनके वस्त्रों के साथ लाल चुनरी लें। 3. चौकी - माता की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करने के लिए एक चौकी। उस पर बिछाने के लिए पीला वस्त्र। 4. नया कलश- घट या कलश स्थापना के लिए एक कलश। कलश में रखने के लिए आम की हरी पत्तियां। 5. माता की आराधना के लिए दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा और दुर्गा आरती की पुस्तक। 6. माता को अर्पित करने के लिए लाल सिंदूर और लाल पुष्प- विशेषकर गुड़हल का फूल। 7. कलश पर रखने के लिए मिट्टी के पात्र, जिसमें जौ के बीज रखे जाएंगे। 8. अक्षत् के लिए चावल, गंगा जल, चंदन, रोली, शहद और कलावा या मौली। 9. नारियल, गाय का घी, सुपारी, लौंग, इलायची। 10. पान का पत्ता, धूप, अगरबत्ती, कपूर। 11. बैठक कर पूजा करने के लिए एक उपयुक्त आसन। हिन्दू संस्कृति या सनातन धर्म के बारे में, व्रत, त्योहार की तिथि नियम जैसे किसी भी प्रकार की जानकारी साझा करने हेतु अथवा रेकी, नुमेरोलॉजी, हीलिंग, रुद्राक्ष, क्रिस्टल, कुंडली, वास्तु, हस्त रेखा, विवाह, घर, धन में कमी, प्रमोशन, नौकरी इत्यादि से सम्बंधित कोई समस्या हो तो आप हमें इस नंबर पर व्हाट्सप्प कर सकते हैं 9152203064</div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Thu, 15 Oct 2020 12:10:23 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[कब से है शारदीय नवरात्रि 2020? जानिए घटस्थापना मुहूर्त]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/when-is-shardiya-navratri-2020-and-what-is-its-ghatsthapna-mahurat</link><description><![CDATA[नवरात्रि त्योहार का हिंदू धर्म में काफी महत्व है. ये त्योहार देश के कोने-कोने में मनाया जाता है. चार प्रकार के मौसमी नवरात्र होते हैं, लेकिन जो सितंबर ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_3vVfX4VRSDq315S2x7JZdw" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_1aAkqMQmTYWcHRsLC_sI0A" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_XhjSbEf9TVCvNmI19YJoWg" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_QYzBsw9lTyiccTvuRHQ7ow" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div><p style="margin-top:5pt;margin-bottom:5pt;font-family:&quot;Nirmala UI&quot;;font-size:12pt;color:rgb(25, 30, 35);">नवरात्रि त्योहार का हिंदू धर्म में काफी महत्व है. ये त्योहार देश के कोने-कोने में मनाया जाता है. चार प्रकार के मौसमी नवरात्र होते हैं, लेकिन जो सितंबर-अक्टूबर के महीनों में पड़ती है उसे शरद या शारदीय नवरात्रि कहा जाता है और यह सबसे ज्यादा मनाया जाने वाला त्योहार है. हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार यह नवरात्रि शरद ऋतु में अश्विन शुक्‍ल पक्ष से शुरू होती हैं और पूरे नौ दिनों तक चलती हैं. इस बार शारदीय नवरात्रि 17 अक्टोबर से शुरू होकर 24 अक्‍टूबर, 2020 तक हैं. 25 अक्‍टूबर, 2020 को विजयदशमी या दशहरा (विजयदशमी ओर दशहरा) मनाया जाएगा.</p><p style="margin-top:5pt;margin-bottom:5pt;font-family:&quot;Nirmala UI&quot;;font-size:12pt;color:rgb(25, 30, 35);"><strong>कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त</strong> नवरात्रि 17 अक्टोबर से शुरू होगी और इसी दिन कलश की स्थापना की जाएगी. मां दुर्गा की कृपा पाने के लिए कलश की स्थापना हमेशा उचित मुहूर्त में ही करनी चाहिए. इस बार नवरात्रि पर कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त प्रात: 6 बजकर 23 मिनट से प्रात: 10 बजकर 12 मिनट तक है। घटस्थापना के लिए अभिजित मुहूर्त प्रात:काल 11:44 से 12:29 तक रहेगा।</p><p style="margin-top:5pt;margin-bottom:5pt;font-family:&quot;Nirmala UI&quot;;font-size:12pt;color:rgb(25, 30, 35);"><strong>कलश स्थापना से जुड़े खास नियम</strong> -कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में करें. -कलश स्थापना करने के लिए पूजन स्थल से अलग एक पाटे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं. इस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर इस पर जल से भरा कलश स्थापित करें. -कलश का मुंह खुला ना रखें, उसे किसी चीज से ढक देना चाहिए. कलश को किसी ढक्कन से ढका है, तो उसे चावलों से भर दें और उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें. -पूजा करने के बाद मां को दोनों समय भोग लगाएं, सबसे सरल और उत्तम भोग हैं लौंग और बताशा. -मां के लिए लाल फूल सर्वोत्तम होता है, पर मां को आक, मदार, दूब और तुलसी बिल्कुल ना चढ़ाएं. -नवरात्रि के दौरान पूरे नौ दिन तक अपना खान-पान और आहार सात्विक रखें.</p><p lang="en-IN" style="margin:0in;font-family:Calibri;font-size:11pt;">हमारे facebook लिंक https://www.facebook.com/JayMahakal01/ को like और share करें twitter और instagram पर फॉलो करे हमारा handle है @jaymahakaal01 और नित नई जानकारियो के लिए हमसे जुड़े रहिये और विजिट करते रहिए www.jaymahakaal.com आप हमसे मेल के माध्यम से संपर्क कर सकते है हमारी EMail id है askus@jaymahakaal.com. साथ ही आप हमें संपर्क भी कर सकते हैं&nbsp; &nbsp; +91 - 9152203064&nbsp; पर</p></div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Wed, 14 Oct 2020 10:46:33 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[पितृपक्ष प्रारंभ विशेष २०२०]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/pitrapaksh-special-2020</link><description><![CDATA[पूर्णिमा श्राद्ध - 2/9/20, बुधवार 1 प्रतिपदा श्राद्ध - 3/9/20 गुरुवार 2 द्वितीया श्राद्ध - 4/9/20 शुक्रवार 3 तृतीया श्राद्ध- 5/9/20 शनिवार 4 चतुर्थी श ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_ef4sJB1nRr-aghYpVSfQsg" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_i-p8-h0rSJWaeIA6AXssGA" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_p2odKRx9Qj6WowtPbz1qAg" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_wZJJzVVnTFmBJVLPc3TSXQ" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div><p>पूर्णिमा श्राद्ध - 2/9/20, बुधवार<br/> 1 प्रतिपदा श्राद्ध - 3/9/20 गुरुवार<br/> 2 द्वितीया श्राद्ध - 4/9/20 शुक्रवार<br/> 3 तृतीया श्राद्ध- 5/9/20 शनिवार<br/> 4 चतुर्थी श्राद्ध-6/9/20 रविवार<br/> 5 पंचमी श्राद्ध- 7/9/20 सोमवार<br/> 6 षष्ठी श्राद्ध-8/9/20 मंगलवार<br/> 7 सप्तमी श्राद्ध- 9/9/20 बुधवार<br/> 8 अष्टमी श्राद्ध- 10/9/20 गुरुवार<br/> 9 नवमी श्राद्ध- 11/9/20 शुक्रवार<br/> 10 दशमी श्राद्ध- 12/9/20 शनिवार<br/> 11 एकादशी श्राद्ध- 13/9/20 रविवार<br/> 12 द्वादशी श्राद्ध- 14/9/20 सोमवार<br/> 13 त्रयोदशी श्राद्ध- 15/9/20 मंगलवार<br/> 14 चतुर्दशी श्राद्ध- 16/9/20 बुधवार<br/> 15 सर्वपितृ अमावस श्राद्ध 17/9/20 गुरुवार</p><p><strong>घर के पितृ रुष्ट होने के लक्ष्ण एवं उपाय:</strong></p><p>बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ -दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ?आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।</p><p>आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है ,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।</p><p>वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है ,जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह वश अपने कुल में जन्म</p><p><strong>पितृ दोष क्या होता है?</strong><br/> हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे &quot;पितृ- दोष&quot; कहा जाता है।</p><p>पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से ,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।</p><p>इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार फल न मिलना , विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं,कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर ,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते,कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।</p><p><strong>पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है</strong></p><p><strong>1.अधोगति वाले पितरों के कारण<br/> 2.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण</strong></p><p>अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण,की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।</p><p>उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते ,परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।</p><p>इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?</p><p>जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।</p><p>इनमें से भी गुरु ,शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।</p><p>अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी ,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है।</p><p>पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।</p><p><strong>विभनं ऋण एवं पितृ दोष</strong></p><p>हमारे ऊपर मुख्य रूप से 5 ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने (ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण।</p><p>मातृ ऋण माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा ,मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं ,इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है।</p><p>पितृ ऋण पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।</p><p>पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है ,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता ,संतान को विभिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि।</p><p>देव ऋण माता-पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी ,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास कराते हैं।</p><p>ऋषि ऋण जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि तर्पण आदि नहीं करती है इस कारण उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए उनका श्राप पीडी दर पीढ़ी प्राप्त होता रहता है।</p><p>मनुष्य ऋण माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की गाय आदि पशुओं का दूध पिया जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया।</p><p>लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित महसूस करते हैं। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़ जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।</p><p>ऐसे परिवार को पितृ दोष युक्त या शापित परिवार कहा जाता है रामायण में श्रवण कुमार के माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है इसलिए परिवार कि सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत आवश्यक है।</p><p><strong>पितरों के रुष्ट होने का लक्षण</strong></p><p>पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्‍य लक्षण जो मैंने अपने निजी अनुभव के आधार एकत्रित किए है वे क्रमशः इस प्रकार हो सकते है।</p><p><strong>खाने में से बाल निकलना</strong></p><p>अक्सर खाना खाते समय यदि आपके भोजन में से बाल निकलता है तो इसे नजरअंदाज नही करना<br/> बहुत बार परिवार के किसी एक ही सदस्य के साथ होता है कि उसके खाने में से बाल निकलता है, यह बाल कहां से आया इसका कुछ पता नहीं चलता। यहां तक कि वह व्यक्ति यदि रेस्टोरेंट आदि में भी जाए तो वहां पर भी उसके ही खाने में से बाल निकलता है और परिवार के लोग उसे ही दोषी मानते हुए उसका मजाक तक उडाते है।</p><p><strong>बदबू या दुर्गंध आना?</strong></p><p>कुछ लोगों की समस्या रहती है कि उनके घर से दुर्गंध आती है, यह भी नहीं पता चलता कि दुर्गंध कहां से आ रही है। कई बार इस दुर्गंध के इतने अभ्‍यस्‍त हो जाते है कि उन्हें यह दुर्गंध महसूस भी नहीं होती लेकिन बाहर के लोग उन्हें बताते हैं कि ऐसा हो रहा है</p><p><strong>शुभ कार्य में अड़चन</strong></p><p>कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कोई त्यौहार मना रहे हैं या कोई उत्सव आपके घर पर हो रहा है ठीक उसी समय पर कुछ ना कुछ ऐसा घटित हो जाता है कि जिससे रंग में भंग डल जाता है। ऐसी घटना घटित होती है कि खुशी का माहौल बदल जाता है। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि शुभ अवसर पर कुछ अशुभ घटित होना पितरों की असंतुष्टि का संकेत है।</p><p><strong>घर के किसी एक सदस्य का कुँवारा रह जाना</strong></p><p>बहुत बार आपने अपने आसपास या फिर रिश्‍तेदारी में देखा होगा या अनुभव किया होगा कि बहुत अच्‍छा युवक है, कहीं कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी शादी नहीं हो रही है। एक लंबी उम्र निकल जाने के पश्चात भी शादी नहीं हो पाना कोई अच्‍छा संकेत नहीं है। यदि घर में पहले ही किसी कुंवारे व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है तो उपरोक्त स्थिति बनने के आसार बढ़ जाते हैं।</p><p><strong>मकान या प्रॉपर्टी खरीदने में दिक्कत आना</strong></p><p>आपने देखा होगा कि कि एक बहुत अच्छी प्रॉपर्टी, मकान, दुकान या जमीन का एक हिस्सा किन्ही कारणों से बिक नहीं पा रहा यदि कोई खरीदार मिलता भी है तो बात नहीं बनती। यदि कोई खरीदार मिल भी जाता है और सब कुछ हो जाता है तो अंतिम समय पर सौदा कैंसिल हो जाता है। इस तरह की स्थिति यदि लंबे समय से चली आ रही है तो यह मान लेना चाहिए कि इसके पीछे अवश्य ही कोई ऐसी कोई अतृप्‍त आत्‍मा है जिसका उस भूमि या जमीन के टुकड़े से कोई संबंध रहा हो।</p><p><strong>संतान ना होना</strong></p><p>मेडिकल रिपोर्ट में सब कुछ सामान्य होने के बावजूद संतान सुख से वंचित है हालांकि आपके पूर्वजों का इस से संबंध होना लाजमी नहीं है परंतु ऐसा होना बहुत हद तक संभव है जो भूमि किसी निसंतान व्यक्ति से खरीदी गई हो वह भूमि अपने नए मालिक को संतानहीन बना देती है</p><p>उपरोक्त सभी प्रकार की घटनाएं या समस्याएं आप में से बहुत से लोगों ने अनुभव की होंगी इसके निवारण के लिए लोग समय और पैसा नष्ट कर देते हैं परंतु समस्या का समाधान नहीं हो पाता। क्या पता हमारे इस लेख से ऐसे ही किसी पीड़ित व्यक्ति को कुछ प्रेरणा मिले इसलिए निवारण भी स्पष्ट कर रहे हैं.</p><p><strong>उपाय</strong></p><p>1 सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान ,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।</p><p>2 वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए।<br/> वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है।</p><p>3 भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :</p><p><strong>मंत्र : &quot;ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।</strong></p><p>4 अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।</p><p>5 अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।</p><p>6 पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए &quot;हरिवंश पुराण &quot; का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें।</p><p>7 प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।</p><p>8 सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल ,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को अर्घ्य देकर ११ बार &quot;ॐ घृणि सूर्याय नमः &quot; मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है।</p><p>9 अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध ,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।</p><p>10 पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य दूर होगा।</p><p><strong>विशेष उपाय :</strong></p><p>1 किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज़ उसमें जल डालें ,उसकी देख -भाल करें ,जैसे-जैसे वृक्ष फलता -फूलता जाएगा,पितृ -दोष दूर होता जाएगा,क्योकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी -देवता ,इतर -योनियाँ ,पितर आदि निवास करते हैं।</p><p>2 यदि आपने किसी का हक छीना है,या किसी मजबूर व्यक्ति की धन संपत्ति का हरण किया है,तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें।</p><p>3 पितृ दोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात एक माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में एक शुद्ध घी का दीपक लगाना चाहिए,ये क्रम टूटना नहीं चाहिए।</p><p><strong>एक माह बीतने पर जो अमावस्या आये उस दिन एक प्रयोग और करें</strong></p><p>इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोडा सा गौ -मूत्र प्राप्त करें उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे ५ अगरबत्ती ,एक नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धा पूर्वक अपने कल्याण की कामना करें,और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें ऐसा करने पर पितृ दोष शांत हो जायेगा।</p><p>4 घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो ,उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें,क्योंके ये पितृ स्थान माना जाता है इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृ दोष शांत होता है।</p><p>5 अगर पितृ दोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो,संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रण होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किये गए अपराध / उपेक्षा के लिए क्षमा याचना करें ,फिर घर अथवा शिवालय में पितृ गायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प ले की इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंके उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है।</p><p>6 पितृ दोष की शांति हेतु ये उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है,वोह ये कि- किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना |(लेकिन ये सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए ,केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं )|इस से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं ,क्योंकि इसके परिणाम स्वरुप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज़ मिलता है ,जिस से वह ऊर्ध्व लोकों की ओरगति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं.|</p><p>7 अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृ दोष उत्पन्न करती है तो तो ऐसी स्थिति में मोह को त्याग कर उसकी सदगति के लिए &quot;गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र &quot; का पाठ करना चाहिए।</p><p>8 पितृ दोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय : इसके लिए सम्बंधित व्यक्ति को अपने घर के वायव्य कोण (न -डब्ल्यू )में नित्य सरसों का तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृ पक्ष में नित्य लगाना चाहिए+दिया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है ,दीपक कम से कम 10 मिनट नित्य जलना आवश्यक है।</p><p>इन उपायों के अतिरिक्त वर्ष की प्रत्येक अमावस्या को दोपहर के समय गूगल की धूनी पूरे घर में सब जगह घुमाएं ,शाम को आंध्र होने के बाद पितरों के निमित्त शुद्ध भोजन बनाकर एक दोने में साड़ी सामग्री रख कर किसी बबूल के वृक्ष अथवा पीपल या बड़ किजद में रख कर आ जाएँ,पीछे मुड़कर न देखें। नित्य प्रति घर में देसी कपूर जाया करें। ये कुछ ऐसे उपाय हैं,जो सरल भी हैं और प्रभावी भी,और हर कोई सरलता से इन्हें कर पितृ दोषों से मुक्ति पा सकता है। लेकिन किसी भी प्रयोग की सफलता आपकी पितरों के प्रति श्रद्धा के ऊपर निर्भर करती है।</p><p><strong>पितृ दोष निवारण के लिए विशेष उपाय ( नारायणबलि नागबलि )</strong></p><p>अक्सर हम देखते हैं कि कई लोगों के जीवन में परेशानियां समाप्त होने का नाम ही नहीं लेती। वे चाहे जितना भी समय और धन खर्च कर लें लेकिन काम सफल नहीं होता। ऐसे लोगों की कुंडली में निश्चित रूप से पितृदोष होता है।</p><p>यह दोषी पीढ़ी दर पीढ़ी कष्ट पहुंचाता रहता है, जब तक कि इसका विधि-विधानपूर्वक निवारण न किया जाए। आने वाली पीढ़ीयों को भी कष्ट देता है। इस दोष के निवारण के लिए कुछ विशेष दिन और समय तय हैं जिनमें इसका पूर्ण निवारण होता है। श्राद्ध पक्ष यही अवसर है जब पितृदोष से मुक्ति पाई जा सकती है। इस दोष के निवारण के लिए शास्त्रों में नारायणबलि का विधान बताया गया है। इसी तरह नागबलि भी होती है।</p><p><strong>क्या है नारायनबली या नागबली?</strong></p><p>नारायणबलि और नागबलि दोनों विधि मनुष्य की अपूर्ण इच्छाओं और अपूर्ण कामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है। इसलिए दोनों को काम्य कहा जाता है। नारायणबलि और नागबलि दो अलग-अलग विधियां हैं। नारायणबलि का मुख्य उद्देश्य पितृदोष निवारण करना है और नागबलि का उद्देश्य सर्प या नाग की हत्या के दोष का निवारण करना है। इनमें से कोई भी एक विधि करने से उद्देश्य पूरा नहीं होता इसलिए दोनों को एक साथ ही संपन्न करना होता है</p><p><strong>इन कारणों से की जाती है नारायनबली</strong></p><p>जिस परिवार के किसी सदस्य या पूर्वज का ठीक प्रकार से अंतिम संस्कार, पिंडदान और तर्पण नहीं हुआ हो उनकी आगामी पीढि़यों में पितृदोष उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों का संपूर्ण जीवन कष्टमय रहता है, जब तक कि पितरों के निमित्त नारायणबलि विधान न किया जाए।प्रेतयोनी से होने वाली पीड़ा दूर करने के लिए नारायणबलि की जाती है।परिवार के किसी सदस्य की आकस्मिक मृत्यु हुई हो। आत्महत्या, पानी में डूबने से, आग में जलने से, दुर्घटना में मृत्यु होने से ऐसा दोष उत्पन्न होता है।</p><p><strong>क्यों की जाती है ये पूजा?</strong></p><p>शास्त्रों में पितृदोष निवारण के लिए नारायणबलि-नागबलि कर्म करने का विधान है। यह कर्म किस प्रकार और कौन कर सकता है इसकी पूर्ण जानकारी होना भी जरूरी है। यह कर्म प्रत्येक वह व्यक्ति कर सकता है जो अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। जिन जातकों के माता-पिता जीवित हैं वे भी यह विधान कर सकते हैं।संतान प्राप्ति, वंश वृद्धि, कर्ज मुक्ति, कार्यों में आ रही बाधाओं के निवारण के लिए यह कर्म पत्नी सहित करना चाहिए। यदि पत्नी जीवित न हो तो कुल के उद्धार के लिए पत्नी के बिना भी यह कर्म किया जा सकता है।यदि पत्नी गर्भवती हो तो गर्भ धारण से पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है। घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो तो ये कर्म एक साल तक नहीं किए जा सकते हैं। माता-पिता की मृत्यु होने पर भी एक साल तक यह कर्म करना निषिद्ध माना गया है।</p><p><strong>कब नही की जाती नारायनबली-नागबली?</strong></p><p>नारायणबलि गुरु, शुक्र के अस्त होने पर नहीं किए जाने चाहिए। लेकिन प्रमुख ग्रंथ निर्णण सिंधु के मतानुसार इस कर्म के लिए केवल नक्षत्रों के गुण व दोष देखना ही उचित है। नारायणबलि कर्म के लिए धनिष्ठा पंचक और त्रिपाद नक्षत्र को निषिद्ध माना गया है।धनिष्ठा नक्षत्र के अंतिम दो चरण, शततारका, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद एवं रेवती, इन साढ़े चार नक्षत्रों को धनिष्ठा पंचक कहा जाता है। कृतिका, पुनर्वसु, विशाखा, उत्तराषाढ़ा और उत्तराभाद्रपद ये छह नक्षत्र त्रिपाद नक्षत्र माने गए हैं। इनके अलावा सभी समय यह कर्म किया जा सकता है।</p><p><strong>पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय</strong></p><p>नारायणबलि- नागबलि के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक श्रेष्ठ समय बताया गया है। इसमें किसी योग्य पुरोहित से समय निकलवाकर यह कर्म करवाना चाहिए। यह कर्म गंगा तट अथवा अन्य किसी नदी सरोवर के किनारे में भी संपन्न कराया जाता है। संपूर्ण पूजा तीन दिनों की होती है।</p><p>हिन्दू संस्कृति या सनातन धर्म के बारे में, व्रत, त्योहार की तिथि नियम जैसे किसी भी प्रकार की जानकारी साझा करने हेतु अथवा कुंडली, वास्तु, हस्त रेखा, विवाह, घर, धन में कमी, प्रमोशन, नौकरी इत्यादि से सम्बंधित कोई समस्या हो तो आप हमें इस नंबर पर व्हाट्सप्प कर सकते हैं +91- 9152203064</p><p>साथ हमें नित्य फॉलो करें हमारे फसेबुक <a 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</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Tue, 01 Sep 2020 16:38:54 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[गणपति की कौनसी मूर्ति है सही?]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/which-idol-of-ganesha-is-best-for-worship</link><description><![CDATA[गाजे बाजे के साथ गणपति बप्पा हमारे द्वार पर दस्तक देने आ रहे हैं। अधिकतर घरों में गणेशजी की प्रतिमा स्थापित कर 10 दिन तक उत्सव की पूरी तैयारी है, लेकि ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_a5MDr5RASqGPTVxTFyMrmA" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_Ab56PWkeTYWtyca6thRacg" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm__vKsTOYcTkWRwzg9F4Pb4A" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_VBWcaEa9SuymKE86Hbc_8w" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div><p>गाजे बाजे के साथ गणपति बप्पा हमारे द्वार पर दस्तक देने आ रहे हैं। अधिकतर घरों में गणेशजी की प्रतिमा स्थापित कर 10 दिन तक उत्सव की पूरी तैयारी है, लेकिन गणेश प्रतिमा को लेकर कुछ बिंदु ऎसे हैं, जिन्हें लेकर असमंजस की स्थिति रहती है। जैसे भगवान की सूंड किस तरफ होना चाहिए, प्रतिमा खड़ी हुई होना चाहिए या बैठे हुए विग्रह की स्थापना की जाना चाहिए।</p><p>मूषक या रिद्धि-सिद्धि साथ हो या ना हो। इसे लेकर हमने विद्वानों से बात कि, उनका मानना है कि दोनों ही तरफ की सूंड वाले गणेश जी शुभ होते हैं? दाई और की सूंड वाले सिद्धि विनायक कहलाते हैं तो बाई सूंड वाले वक्रतुंड हालांकि शास्त्रों में दोनों का पूजा विधान अलग-अलग बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि दाएं हाथ की ओर मुड़ी हुई सूंड वाली गणेश जी प्रतिमा की पूजा से मनोकामना सिद्घ होने में देर लगती है क्योंकि इस तरह की सूंड वाले गणेश जी देर से प्रसन्न होते हैं। यदि सूंड दायीं तरफ है तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए क्योंकि दायीं तरफ सूंड वाले गणेश जी को तंत्र कार्यों के प्रयोग में लिया जाता है।</p><p>बाएं सूंड वाले प्रतिमा से गणेश जी जल्दी प्रसन्न होते हैं। गणपति जी की बाईं सूंड में चंद्रमा का और दाईं में सूर्य का प्रभाव माना गया है। बाएं सूंड वाली मूर्ति की पूजा स्थायी कार्यों के लिए की जाती है। जैसे शिक्षा, धन प्राप्ति, व्यवसाय, उन्नति, संतान सुख, विवाह, सृजन कार्य और पारिवारिक खुशहाली।सीधी सूंड वाली मूर्त का सुषुम्रा स्वर माना जाता है और इनकी आराधना रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, मोक्ष, समाधि आदि के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। बाई ओर घूमी हुई सूंड वाले गणेशजी विघ्नविनाशक कहलाते हैं। इन्हें घर में मुख्य द्वार पर लगाने के पीछे तर्क है कि जब हम कहीं बाहर जाते हैं तो कई प्रकार की बलाएं, विपदाएं या नेगेटिव एनर्जी हमारे साथ आ जाती है। घर में प्रवेश करने से पहले जब हम विघ्वविनाशक गणेशजी के दर्शन करते हैं तो इसके प्रभाव से यह सभी नेगेटिव एनर्जी वहीं रूक जाती है व हमारे साथ घर में प्रवेश नहीं कर पाती</p><p>हमारे facebook लिंक <a href="https://www.facebook.com/JayMahakaal01/" target="_blank" rel="noreferrer noopener">https://www.facebook.com/JayMahakal01/</a> को like और share करें twitter और instagram पर फॉलो करे हमारा handle है @jaymahakaal01 और नित नई जानकारियो के लिए हमसे जुड़े रहिये और विजिट करते रहिए <a href="http://localhost:10004" target="_blank" rel="noreferrer noopener">www.jaymahakaal.com</a> आप हमसे मेल के माध्यम से संपर्क कर सकते है हमारी EMail id है askus@jaymahakaal.com</p></div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Mon, 24 Aug 2020 08:47:33 +0000</pubDate></item><item><title><![CDATA[क्यों मनाते हैं गणेश चतुर्थी]]></title><link>https://testsstore1.zohoecommerce.in/blogs/post/why-we-celebrate-ganesh-chaturthi</link><description><![CDATA[गणेश चतुर्थी बुद्धि एवं ज्ञान के देवता भगवान गणेश की पूजा का सबसे बड़ा दिन माना जाता है, गणेशोत्सव भारत के सबसे बड़े हिन्दू पर्वों में से एक है। गणेशो ]]></description><content:encoded><![CDATA[
<div class="zpcontent-container blogpost-container "><div data-element-id="elm_TmkD6slvReOGfVoNNqlFmg" data-element-type="section" class="zpsection "><style type="text/css"></style><div class="zpcontainer"><div data-element-id="elm_HO1dJH_WTCaXusq5VU_mnA" data-element-type="row" class="zprow zpalign-items- zpjustify-content- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_vbUOoVQiSF6XSGpNwVO-NA" data-element-type="column" class="zpelem-col zpcol-12 zpcol-md-12 zpcol-sm-12 zpalign-self- "><style type="text/css"></style><div data-element-id="elm_Ns6C4cTtTjy4rifjZECfAw" data-element-type="text" class="zpelement zpelem-text "><style></style><div class="zptext zptext-align-center " data-editor="true"><div><p>गणेश चतुर्थी बुद्धि एवं ज्ञान के देवता भगवान गणेश की पूजा का सबसे बड़ा दिन माना जाता है, गणेशोत्सव भारत के सबसे बड़े हिन्दू पर्वों में से एक है। गणेशोत्सव देश भर में मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र में इसकी धूम कुछ ज्यादा ही होती है। इस त्योहार में हिन्दू धर्म के प्रथम पूज्य देवता भगवान गणेश की पूजा की जाती है।</p><p>हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इसे मनाया जाता है। नारद पुराण के अनुसार भगवान शिव ने देवी पार्वती द्वारा उत्पन्न बालक की गर्दन काट दी थी, जिसके बाद माता पार्वती के कहने पर भगवान शिव ने उस बालक के धड़ में एक हाथी का सिर लगा दिया और इससे भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई थी, तब से ही इस दिन को गणेश उत्सव के रूप में मनाया जाता है।</p><p>गणेशोत्सव का पर्व यूं तो मराठा सम्राट शिवाजी के समय से शुरु हो गया था जिसके बाद पेशवा और मराठा सम्राज्य के कई राजघरानों ने इसे अपनाया, सार्वजनिक तौर पर इसे आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजसेवी बाल गंगाधर को जाता है, जिन्होंने पुणे में इस पर्व को लोगों के घरों तक पहुंचाया इस लिए ऐसा भी कहा जा सकता है कि सबसे पहले इस त्यौहार की शुरु पुणे से की गई थी।</p><p>इस वर्ष गणेश चतुर्थी २२ अगस्त, २०२०, शनिवार को है। इसे श्रीगणेश चतुर्थी, पत्थर चौथ और कलंक चौथ के नाम भी जाना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है की पहले यह पर्व सिर्फ एक दिन ही मनाया जाता था, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी के पर्व के रूप में मनाया जाता था इसके बाद फिर 10 दिन गणपति पूजा की परम्परा शुरू हुई। अंग्रेजो के शासन काल में युवाओं में अपने धर्म के प्रति नकारात्मकता और अंग्रेजी आचार-विचार के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था और हिंदू अपने धर्म के प्रति उदासीन होने लगे थे, उस समय महान क्रांतिकारी व जननेता लोकमान्य तिलक ने सोचा कि हिंदू धर्म को कैसे संगठित किया जाए? तिलक ने गणेशोत्सव को आजादी की लड़ाई के लिए एक प्रभावशाली साधन बनाया। जिसमें ये तय किया गया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक गणेश उत्सव मनाया जाए। 10 दिनों के इस उत्सव में हिंदुओं को एकजुट करने व देश को आजाद करने के लिए विभिन्न योजनाओं पर भी विचार किया जाता था।&nbsp;अब सामूहिक रूप के साथ साथ लोग अपने अपने घरों में गणेश उत्सव को मनाने लगें हैं और गणपति पूजा कर घर में संपन्नता और सौभाग्य की मंगल कामना करते हैं।</p><p>हमारे facebook लिंक <a href="https://www.facebook.com/JayMahakaal01/" target="_blank" rel="noreferrer noopener" title="https://www.facebook.com/JayMahakal01/">https://www.facebook.com/JayMahakal01/</a> को like और share करें twitter और instagram पर फॉलो करे हमारा handle है @jaymahakaal01 और नित नई जानकारियो के लिए हमसे जुड़े रहिये और विजिट करते रहिए <a href="http://localhost:10004" target="_blank" rel="noreferrer noopener">www.jaymahakaal.com</a> आप हमसे मेल के माध्यम से संपर्क कर सकते है हमारी</p></div></div>
</div></div></div></div></div></div> ]]></content:encoded><pubDate>Sun, 23 Aug 2020 08:53:10 +0000</pubDate></item></channel></rss>